प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक चेतना में आर्षशिक्षा का अवदान
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में शिक्षा की भूमिका और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है जहाँ अनेक भाषाएँ, उप-संस्कृतियाँ, परंपराएँ और सामाजिक परिस्थितियाँ हैं। ऐसी स्थिति में शिक्षा ही वह शक्ति है जो विविधता में एकता स्थापित करती है, नागरिकों में राष्ट्रीय चेतना का विकास करती है और संवैधानिक मूल्यों को जन सामान्य तक पहुँचाती है। शिक्षा व्यक्ति को अधिकारों के साथ कर्तव्यों का भी बोध कराती है। वह सिखाती है कि राष्ट्र केवल किसी भू-भाग का नाम नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक इकाई है।
आज समूची दुनिया अशांत है, अधिनायकवाद और प्राकृतिक संसाधनों पर एकाधिकार की मानसिकता ने अनेक देशों को युद्ध की विभीषिका में धकेला है जिससे अनेक देशों में अस्थिरता उत्पन्न हुई है। विश्व के आर्थिक विकास के साथ विज्ञान एवं तकनीकी उन्नति के उपरांत भी विश्वभर का मनुष्य अधिक त्रस्त है। अवसाद और आत्महत्याओं का क्रम निरंतर बढ़ा है, विशेष रूप से विद्यार्थियों तथा रोजगारोन्मुख युवाओं में। इसके अनेक कारण हो सकते हैं, संभवतः उनमें सबसे प्रमुख कारण शिक्षा का राष्ट्र- केंद्रित तथा विद्यार्थी-केन्द्रित न होकर व्यवस्था-केन्द्रित होना है। पूर्ण लेख देखने के लिए क्लिक करे
