वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः
शैक्षिक मंथन का प्रस्तुत अंक ‘शिक्षा के लिए शिक्षक’ विषय पर केंद्रित है। इसमें लेखकों द्वारा बदलते सामाजिक परिवेश और वैश्विक परिदृश्य में शिक्षक की भूमिका तथा शिक्षा के वर्तमान स्वरूप पर गहन चिंतन प्रस्तुत किया गया है। वर्तमान विश्व डिजिटल क्रांति के साथ तीव्र परिवर्तनों से प्रभावित है, जिसमें भौतिक संसाधनों के प्रति उत्कट लालसा प्रबल हुई है। संवेदनशीलता, करुणा, सद्भाव और सह-अस्तित्व जैसे उदात्त मानवीय मूल्यों का अतिशय क्षरण हुआ है। ज्ञान सूचना में परिवर्तित हुआ है तथा मोबाइल और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रयोग के कारण विद्यार्थी की मनः स्थिति एवं व्यवहार में भी तेजी से परिवर्तन दिखाई दे रहा है। ऐसे में भारत की गुरु-परंपरा की पुनर्स्थापना पूर्णतया प्रासंगिक लगती है।
भारतीय संस्कृति में गुरु को केवल ज्ञानदाता नहीं, बल्कि जीवन का निर्माता, समाज का पथप्रदर्शक और राष्ट्र की आत्मा का संवाहक माना गया है। वैदिक वाड्मय में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समकक्ष प्रतिष्ठित किया गया है। भारतीय शिक्षा का उद्देश्य सदैव मनुष्य के सर्वांगीण विकास, आत्मबोध, सामाजिक उत्तरदायित्व और लोकमंगल रहा है। इसलिए हमारे यहाँ शिक्षा को केवल जीविका का नहीं बल्कि ‘जीवन’ का साधन माना गया है। पूर्ण लेख देखने के लिए क्लिक करे
